
Propitiation of Yama (Crossing the Vaitaraṇī through the Dvādaśī/Vaitaraṇī-vrata)
इस अध्याय में नारद नरक और भयावह वैतरणी नदी से बचने हेतु यम की आराधना की विधि पूछते हैं। महादेव उत्तर देते हुए मुद्गल मुनि की कथा कहते हैं—यम के किंकरों ने भ्रमवश उन्हें पकड़ लिया, और उसी प्रसंग में यमधर्मराज ने कृष्ण-पक्ष की द्वादशी को ‘वैतरणी-व्रत’ बताकर उसके उद्धारक प्रभाव का वर्णन किया। फिर व्रत की विधि विस्तार से आती है—उपवास, तीर्थ-स्नान (मिट्टी/गोमय/तिल सहित) और मंत्रोच्चार, गोविंद-विष्णु का पूजन, पात्र-व्यवस्था व मंडल-रचना, यम तथा चित्रगुप्त का आवाहन-नमस्कार, और वैतरणी/जया देवी की वंदना। तुलसी-सेवा, तिलक/शस्त्र-चिह्न धारण, गो-पूजा आदि सहायक कर्म बताए गए हैं; फल रूप में पापक्षय, यम-त्रास से मुक्ति और वैतरणी का सुरक्षित पार होना कहा गया है।
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