
The Concluding Observance (Udyāpana) of the Cāturmāsya Vows
इस अध्याय में चातुर्मास्य व्रतों की अनिवार्य पूर्णता ‘उद्यापन’ के रूप में बताई गई है। नारद समापन-विधि पूछते हैं; उमापति शिव समझाते हैं कि उdyापन के बिना व्रत का फल पूर्ण नहीं मिलता और अपूर्ण/त्रुटिपूर्ण आचरण से भारी कर्मदोष भी हो सकता है। चातुर्मास्य के बाद जगन्नाथ के जागरण पर व्रती ब्राह्मणों के पास जाकर क्षमा-याचना करता है, भगवान से प्रायश्चित्त-भाव से निवेदन करता है और जो वस्तु व्रत में छोड़ी थी उसके बदले पूरक दान देता है—जैसे तेल-त्याग हो तो घी, घी-त्याग हो तो दूध आदि। फिर व्रत-विशेष के अनुसार दान और भोजन का विधान है: मौन-दिन पर स्वर्ण सहित तिल-लड्डू, भोजन-दिन पर दही-भात, रात्रि-भोजन-व्रत में षड्रस भोजन, स्वर्ण सहित गाय-बैल, दीपदान (स्वर्ण-दीप सहित), पादुका, अन्न-फल, कोठार/भंडार आदि। अंत में शंख-चक्र-गदा-धारी अनादि विष्णु की शुद्ध भाव से पूजा कर पाप-नाशक प्रभु के चरणों में व्रत की पूर्णता स्थापित की जाती है।
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