Adhyaya 65
Uttara KhandaAdhyaya 650

Adhyaya 65

The Concluding Observance (Udyāpana) of the Cāturmāsya Vows

इस अध्याय में चातुर्मास्य व्रतों की अनिवार्य पूर्णता ‘उद्यापन’ के रूप में बताई गई है। नारद समापन-विधि पूछते हैं; उमापति शिव समझाते हैं कि उdyापन के बिना व्रत का फल पूर्ण नहीं मिलता और अपूर्ण/त्रुटिपूर्ण आचरण से भारी कर्मदोष भी हो सकता है। चातुर्मास्य के बाद जगन्नाथ के जागरण पर व्रती ब्राह्मणों के पास जाकर क्षमा-याचना करता है, भगवान से प्रायश्चित्त-भाव से निवेदन करता है और जो वस्तु व्रत में छोड़ी थी उसके बदले पूरक दान देता है—जैसे तेल-त्याग हो तो घी, घी-त्याग हो तो दूध आदि। फिर व्रत-विशेष के अनुसार दान और भोजन का विधान है: मौन-दिन पर स्वर्ण सहित तिल-लड्डू, भोजन-दिन पर दही-भात, रात्रि-भोजन-व्रत में षड्रस भोजन, स्वर्ण सहित गाय-बैल, दीपदान (स्वर्ण-दीप सहित), पादुका, अन्न-फल, कोठार/भंडार आदि। अंत में शंख-चक्र-गदा-धारी अनादि विष्णु की शुद्ध भाव से पूजा कर पाप-नाशक प्रभु के चरणों में व्रत की पूर्णता स्थापित की जाती है।

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