
Nirjalā Ekādaśī of the Bright Fortnight of Jyeṣṭha (Bhīma’s Waterless Fast; Pāṇḍava-dvādaśī Fame)
इस अध्याय में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को सर्वश्रेष्ठ ‘निर्जला’ कहा गया है—जिसमें जल तक का त्याग होता है। युधिष्ठिर के प्रश्न से प्रसंग आरम्भ होता है; श्रीकृष्ण उन्हें प्रमाणरूप से वेदव्यास के पास भेजते हैं। व्यास बताते हैं कि कलियुग में पूर्ण वैदिक कर्म कठिन हैं, इसलिए एकादशी पुराणोक्त धर्म का सार और सहज साधन है। भीमसेन तीव्र भूख के कारण बार-बार उपवास नहीं कर पाते और एक ऐसा एकमात्र व्रत पूछते हैं जो सब एकादशियों का फल दे। तब व्यास ‘निर्जला एकादशी’ का विधान करते हैं—एकादशी को अन्न-जल का पूर्ण त्याग; द्वादशी को स्नान, विष्णु-पूजन, दान और ब्राह्मणों को भोजन। कहा गया है कि यह व्रत समस्त एकादशियों के पुण्य के तुल्य है, पापों का नाश करता है, यमदूतों से रक्षा करता है और विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है। अंत में जल-घट, गोदान या जलधेनु-प्रतिदान, वस्त्र, पादुका, छत्र आदि दानों का निर्देश है; और यह व्रत ‘पाण्डव-द्वादशी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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