Adhyaya 50
Uttara KhandaAdhyaya 500

Adhyaya 50

The Greatness of Aparā Ekādaśī in the Dark Fortnight of Jyeṣṭha

युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम और महात्म्य क्या है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह ‘अपरा एकादशी’ है, जो यश, संतान और विशेष रूप से बड़े-बड़े पापों के नाश का फल देती है। अध्याय में शिक्षा के रूप में महापापों की सूची दी गई है—ब्राह्मणहत्या आदि, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही, तौल-नाप में धोखा, वेद-धर्म का ढोंग करके जीविका, युद्ध में धर्म त्याग, तथा गुरु का अपमान। अपरा-व्रत को इन दोषों को भस्म करने वाला बताया गया है। फिर इसके पुण्य की तुलना महान तीर्थ-फलों से की जाती है—माघ में प्रयाग-स्नान, ग्रहण में काशी-वास, गया-श्राद्ध, गुरु के गोचर में गोदावरी/कृष्णवेणी-स्नान, बदरी-यात्रा, और कुरुक्षेत्र में ग्रहण-काल दान। अंत में कहा गया है कि त्रिविक्रम (विष्णु) की उपासना सहित उपवास करने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है, और इसका श्रवण-पाठ भी महादान के समान पुण्य देता है।

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