
The War between the Devas and the Dānavas (Jālandhara’s Campaign Begins)
युधिष्ठिर के पूछने पर नारद जी बताते हैं कि जलन्धर का देव-विरोध क्षीरसागर-मन्थन से जुड़ा है, जिसमें श्री, सोम, अमृत आदि रत्न प्रकट हुए। उन्हीं समुद्रज रत्नों और स्वर्ग पर अधिकार की लालसा से जलन्धर ने दुरुवाराण नामक दूत को इन्द्र की सभा में भेजकर सब कुछ माँग लिया। इन्द्र ने उत्तर दिया कि मन्थन समुद्र के अधर्म-सहयोग को रोकने हेतु हुआ था और जलन्धर का विनाश निश्चित है। इससे क्रुद्ध होकर जलन्धर ने रसातल तथा पृथ्वी के दैत्य-दानवों की विशाल सेना जुटाई और मन्दर–मेरु–इलावृत आदि मार्गों से चढ़ाई की; मार्ग में दिव्य उपवनों को उजाड़ दिया। अमरावती में अशुभ शकुन होने लगे; इन्द्र ने बृहस्पति से परामर्श कर विष्णु की शरण ली। श्री ने जलन्धर की स्थिति का संकेत देकर सावधान किया, फिर भी हरि देवताओं को साथ लेकर युद्ध हेतु अग्रसर हुए। आदित्य, रुद्र, मरुत आदि देवगणों की सेनाएँ सजती हैं और दोनों पक्षों के समकक्ष वीरों के साथ भयंकर देव–दानव संग्राम आरम्भ हो जाता है।
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