
Amalaki Ekadashi (Phalguna Bright Fortnight): Origin, Deity-Body Mapping, and Vigil Procedure
इस अध्याय में वसिष्ठ मांडहाता राजा से कहते हैं कि धात्री/आँवला-वृक्ष परम वैष्णव तीर्थ है; उसका स्मरण, स्पर्श और धारण करने से पुण्य अनेक गुना बढ़ता है। ब्रह्मा के मुख से निकली तेजस्वी बूँद से इस वृक्ष की उत्पत्ति बताई गई है; देव-ऋषि उसे देखकर विस्मित होते हैं। तभी एक अशरीरी वाणी प्रकट होकर इसकी महिमा कहती है और स्वयं को सनातन विष्णु बताती है। फिर विष्णु फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी के शुभ काल का निर्देश देते हैं—विशेषतः जब द्वादशी का पुष्य नक्षत्र से योग हो। जागरण, पूजन, अर्घ्य, प्रदक्षिणा, भजन-कीर्तन/पाठ, प्रातः आरती तथा ब्राह्मणों को दान-भोजन की विधि बताई जाती है। जागरण का फल सहस्र गोदान के समान कहा गया है और विष्णुलोक से पतन न होने का आश्वासन दिया गया है।
No shlokas available for this adhyaya yet.