Adhyaya 43
Uttara KhandaAdhyaya 430

Adhyaya 43

The Greatness of Jayā Ekādaśī (Māgha, Bright Fortnight)

इस अध्याय में माघ शुक्ल पक्ष की ‘जया एकादशी’ के व्रत का माहात्म्य बताया गया है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह एकादशी परम पावन है—ब्रह्महत्या जैसे महापापों को भी हरती है और पिशाच-योनि जैसी अधोगति से भी उद्धार करती है। कथा के भीतर दिव्य प्रसंग आता है: गन्धर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पदन्ती इन्द्र की आज्ञा का अनादर कर क्रीड़ा में लीन रहते हैं, इसलिए इन्द्र उन्हें शाप देकर पिशाच बना देता है। वे हिमालय पर दुःख भोगते हैं; पर दैवयोग से जया एकादशी के दिन उनके द्वारा अनजाने में उपवास, अहिंसा और रात्रि-जागरण हो जाता है। विष्णु-प्रभाव से उनका पिशाचत्व नष्ट होकर वे अपने दिव्य रूप में लौट आते हैं। स्वर्ग में वे वासुदेव और जया-व्रत की महिमा बताते हैं; इन्द्र उनकी शुद्धि स्वीकार कर हरि-भक्ति की प्रशंसा करता है। अंत में श्रीकृष्ण एकादशी-व्रत तथा इस कथा के श्रवण-पाठ का उपदेश देते हैं और वैकुण्ठ में दीर्घ निवास का फल बताते हैं।

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