Adhyaya 36
Uttara KhandaAdhyaya 360

Adhyaya 36

The Greatness of Pakṣavardhinī Ekādaśī (Fortnight-Increasing Observance)

शिव–नारद संवाद में नारद पूछते हैं कि पक्षवर्धिनी एकादशी का व्रत महापापों से कैसे मुक्त करता है। महादेव इसके तिथि-आधार, पक्ष-वृद्धि के अनुसार इसके नियम, और इसके अद्भुत पुण्य का वर्णन करते हैं, जिसे महान यज्ञों के फल के समान बताया गया है। फिर अध्याय में विस्तृत वैष्णव पूजा-विधि आती है—कलश की तैयारी, पात्र, रत्न, धान्य आदि सामग्री, मास के अनुसार नामित स्वर्ण-प्रतिमा, पंचामृत स्नान, सुगंधित अनुलेपन, वस्त्र-आभूषण, और अर्घ्य अर्पण। देह-समर्पण के क्रम में विष्णु के दिव्य नामों से अंग-न्यास किया जाता है और संसार से उद्धार की प्रार्थनाएँ की जाती हैं। अंत में नैवेद्य, दीपदान, गुरु-सत्कार, तथा रात्रि-जागरण—गीत, नृत्य और पुराण-पाठ सहित—बताया गया है। फलश्रुति में पाप-नाश, मनोकामना-पूर्ति और इस व्रत को करने वालों के उदाहरण दिए गए हैं।

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