
Praise of Land-Donation (Bhū-dāna) and the Sin of Land-Theft
यज्ञ पूर्ण होने पर इन्द्र ने बृहस्पति से पूछा कि कौन-सा दान अविनाशी और सर्वोत्तम है। बृहस्पति ने कहा—भूमि-दान (भू-दाना) सर्वश्रेष्ठ दान है; यह स्वर्ण, गौ, वस्त्र और रत्न-दान के समान फल देता है और पृथ्वी तथा सूर्य के रहने तक उसका पुण्य अक्षय रहता है। भूमि की माप (गो-चर्म आदि) बताकर उन्होंने संयमी, तपस्वी ब्राह्मणों को योग्य पात्र कहा। इसके बाद कठोर निषेध बताए गए—दान की हुई भूमि छीनना, सीमा का अतिक्रमण करना, भूमि-विषय में झूठी गवाही देना और ब्राह्मण की संपत्ति हड़पना घोर पाप है; इससे नरक, पशु-योनि और कुल-नाश तक होता है। साथ में अन्न-वस्त्र-दान, जल-कार्य (कूप/सेतु), दीप-दान, दक्षिणा, अहिंसा और सत्य के पुण्य भी बताए गए। अंत में फलश्रुति है कि इस बृहस्पति-धर्म का पाठ आयु, ज्ञान, यश और बल बढ़ाता है।
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