
Brahmāgama — Brahmā’s Approach/Teaching (Birth of Jālandhara)
नारद काम्यवन में शोकाकुल पाण्डवों के पास आते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि किस कर्म के कारण हम दुःख में पड़े हैं। नारद देहधारी जीवन में दुःख की अनिवार्यता और भाग्य-परिवर्तन की निश्चितता समझाते हैं; उदाहरण देते हैं कि राहु जैसे बलवान का भी पतन होता है, और विष्णु, जालन्धर तथा शिव से जुड़ी घटनाओं में महान् शक्तियों को भी उलट-फेर देखना पड़ता है। फिर युधिष्ठिर जालन्धर का परिचय और शिव द्वारा उसके वध का कारण पूछते हैं। नारद बताते हैं कि इन्द्र और देवगण दिव्य गीत-नृत्य के साथ कैलास पहुँचे; शम्भु ने इन्द्र को वर दिया, जिससे इन्द्र का युद्ध-गर्व भड़क उठा। शिव का क्रोध ‘क्रोध’ नाम से मूर्त होकर समुद्र-लोक की ओर गया और समुद्र के संयोग से एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा वहाँ आकर उस अद्भुत बालक को देखकर उसका नाम ‘जालन्धर’ रखते हैं और आशीर्वाद देते हैं कि वह देवताओं से अजेय रहेगा तथा स्वर्ग और पाताल—दोनों लोकों के भोग का अधिकारी होगा।
No shlokas available for this adhyaya yet.