Adhyaya 251
Uttara KhandaAdhyaya 2510

Adhyaya 251

Destruction of the Kṛtyā Performed by Pauṇḍraka’s Son

पौण्ड्रक ने काशी में बारह वर्षों तक कठोर शैव तप किया—उपवास, मंत्र-जप और अंत में अत्यन्त उग्र पुरश्चरण, जिसमें उसने अपने नेत्र-कमल का अर्पण तक कर दिया। प्रसन्न होकर शूलपाणि शिव ने उसे विष्णु-सदृश रूप और चिह्न प्रदान किए। इस वरदान से मोहित होकर पौण्ड्रक ने अपने को “वासुदेव” घोषित किया और जगत को भ्रमित करने लगा; नारद के उकसावे से वह अक्षौहिणी सेना लेकर द्वारका पर चढ़ आया। रण में श्रीकृष्ण ने उसकी सेना का संहार किया, उसके नकली चिह्न छीन लिए और सुदर्शन चक्र से पौण्ड्रक का शिरच्छेद कर दिया। तब उसके पुत्र दण्डपाणि ने कृष्ण-वध हेतु शैव विधि से कृत्या उत्पन्न की; पर सुदर्शन के भय से वह उलटी वाराणसी की ओर भागी। वहाँ सुदर्शन ने कृत्या का विनाश किया, दण्डपाणि का वध किया, काशी को दग्ध कर अंत में पुनः कृष्ण के हाथ में लौट आया।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.