
Narration of Rukmiṇī’s Marriage
इस अध्याय में श्रीकृष्ण के द्वारका लौटने और रुक्मिणी के विवाह का वैदिक विधि से सम्पन्न होना वर्णित है। देवदुन्दुभियाँ बजती हैं और पुष्पवृष्टि होती है, जिससे इस विवाह की दिव्य मंगलता प्रकट होती है। बलभद्र, वसुदेव, उग्रसेन, अक्रूर आदि यदुवंशीय तथा नन्द-यशोदा ग्वालों और गोपियों सहित उपस्थित होते हैं; ब्राह्मण ऋत्विज मंत्रोच्चार से संस्कार कराते और वर-वधू को आशीर्वाद देते हैं। दान, अतिथि-सत्कार और आगन्तुक राजाओं व ब्राह्मणों का सम्मान—धर्मयुक्त राजधर्म और गृहस्थ-नीति का आदर्श दिखाते हैं। अंत में जातवेद (अग्नि) की वंदना, बड़ों और ब्राह्मणों को प्रणाम तथा अतिथियों की विधिवत विदाई होती है। फिर श्रीकृष्ण और रुक्मिणी दिव्य प्रासाद में नारायण-श्री के समान सुखपूर्वक निवास करते हैं और ऋषि-देवगण उनकी स्तुति करते हैं।
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