
The Deeds of Paraśurāma (Life of Jāmadagnya and the Slaying of Kārttavīrya)
उमा–महेश्वर संवाद में महादेव जमदग्नि के तप का वर्णन करते हैं। तप से प्रसन्न होकर इन्द्र ने उन्हें सुरभि/शबला कामधेनु प्रदान की, जिससे आश्रम में महान समृद्धि हुई। तभी हैहय राजा कार्त्तवीर्य अर्जुन कामधेनु पर लोभ करता है; जमदग्नि के अस्वीकार करने पर वह बलपूर्वक उसे छीन लेता है और संघर्ष में जमदग्नि का वध कर देता है। इसके बाद जामदग्न्य परशुराम, जिन्हें विष्णु का शक्त्यावेश अंश कहा गया है, कश्यप से वैष्णव मन्त्र-दीक्षा पाकर केशव से दिव्य सामर्थ्य और अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं। वे पिता-वध का प्रतिशोध लेकर कार्त्तवीर्य का संहार करते हैं, फिर व्यापक रूप से क्षत्रियों का दमन करते हुए अश्वमेध यज्ञ करते हैं और पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर देते हैं। अंत में सिद्धान्त स्पष्ट किया गया है कि शक्त्यावेश पुरुष स्वतंत्र देवता मानकर पूज्य नहीं होते; पूर्ण अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण ही मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
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