Adhyaya 234
Uttara KhandaAdhyaya 2340

Adhyaya 234

The Glory of Dvādaśī (Twelfth Lunar Day Observance)

पार्वती द्वादशी-व्रत की विधि और विष्णु-पूजन का क्रम पूछती हैं तथा एकादशी की पाप-नाशक शक्ति का रहस्य जानना चाहती हैं। महादेव और बीच-बीच में आए उपदेशात्मक वचन एकादशी-उपवास की महिमा बताते हैं—यह बड़े-बड़े वैदिक यज्ञों से भी श्रेष्ठ, पाप से बचाने वाला सर्वोत्तम कवच और व्रतों में प्रधान है। फिर व्यवहारिक व्रत-धर्म बताया जाता है—दशमी/एकादशी की तिथि-मिश्रता से बचें, अरुणोदय में नियत कर्तव्य करें, और द्वादशी में पारण अवश्य करें, चाहे द्वादशी का थोड़ा-सा अंश ही शेष हो। दशमी को संयम, आँवला-स्नान, रात्रि-पूजन व जागरण, तुलसी-अर्पण, लक्ष्मी–नारायण-पूजन, 108 बार आरती, क्षीर/पायस का नैवेद्य, पुरुषसूक्त व लक्ष्मीसूक्त से 108 आहुतियों का होम, ब्राह्मण-भोजन और शास्त्र-पाठ का विधान है। अंत में कहा गया है कि इस विधि से विष्णु शीघ्र प्रसन्न होकर मनोवांछित वर देते हैं।

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