Adhyaya 230
Uttara KhandaAdhyaya 2300

Adhyaya 230

Description of the Fish Incarnation (Matsyāvatāra)

उमा–महेश्वर संवाद में पार्वती पूछती हैं कि मधुसूदन ने राक्षसों का वध कैसे किया, और मत्स्य तथा कूर्म आदि अवतारों से आरम्भ करके हरि के अवतार-वैभव का विस्तृत वर्णन चाहती हैं। शिव दीप से दीप जलने के दृष्टान्त द्वारा बताते हैं कि भगवान् अपनी इच्छा से प्रकट होते हैं; वे परात्पर स्वरूप, व्यूह/विभव रूप तथा अर्चा-स्वरूप (प्रतिमा में निवास) का भेद समझाकर अवतार-तत्त्व स्पष्ट करते हैं। फिर आद्य वंश-परम्परा आती है—मरीचि से कश्यप, कश्यप से अदिति के देवता और दिति के शक्तिशाली असुर-राक्षस, जिनमें हयग्रीव और हिरण्याक्ष प्रमुख हैं। एक दानव वेदों को छीनकर निगल लेता है और समुद्र में छिप जाता है; इससे धर्म और वर्णाश्रम-व्यवस्था का लोप-सा हो जाता है। ब्रह्मा और देवगण क्षीरसागर के तट पर भगवान् की स्तुति करते हैं। तब हरि मत्स्य रूप धारण कर समुद्र में प्रवेश करते हैं, दानव का वध करके वेदों को ब्रह्मा को लौटा देते हैं; आगे व्यास-रूप से वेदों के विभाग को स्पष्ट कर लोकों की रक्षा करते हैं और फिर अंतर्धान हो जाते हैं।

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