
Instruction on the Meaning of Mantras (Vaiṣṇava Nyāsa, Guru-Authority, and Aṣṭākṣarī Exegesis)
इस अध्याय में उमा–महेश्वर संवाद के भीतर वैष्णव-प्रधान उपदेश दिया गया है। पहले गुरु-योग्यता निश्चित की जाती है—मंत्र केवल वैष्णव आचार्य से ही ग्रहण करने योग्य हैं; अत्यधिक वैदिक पाण्डित्य होने पर भी अवैष्णव गुरु नहीं माना जाता। दीक्षा के चिह्न भी बताए गए हैं—ताप (मुद्रांकन/अंकन), ऊर्ध्व-पुण्ड्र धारण और वैष्णव नाम-ग्रहण। फिर न्यास को सर्वोच्च साधना कहा गया है और उसे प्रपत्ति (शरणागति) के तुल्य बताया गया है। आगे अष्टाक्षरी ‘ॐ नमो नारायणाय’ का अर्थ-विवेचन आता है—प्रणव की प्रधानता तथा मंत्राङ्ग (ऋषि, देवता, छन्द, बीज, शक्ति) का निर्देश। अंत में नारायण को सर्वव्यापक परमेश्वर और जीव को नित्य परतंत्र सेवक मानकर यह निष्कर्ष दिया गया है कि मंत्र की सिद्धि उसके अर्थ-ज्ञान के बिना पूर्ण नहीं होती।
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