
The Greatness of the Ūrdhva-puṇḍra (Vaiṣṇava Vertical Tilaka)
उत्तरा-खण्ड के अध्याय 225 में महादेव (शंकर) गिरिजा से ऊर्ध्व-पुण्ड्र (वैष्णव तिलक) का माहात्म्य और विधि बताते हैं। कहा गया है कि तिलक की मध्य-रेखा के अंतराल में हरि (जनार्दन) और श्री का निवास होता है; इसलिए तिलकधारी का शरीर मंदिर के समान हो जाता है और तिलक सहित किया गया जप, दान, होम, पूजा आदि अक्षय पुण्य देने वाला होता है। इसके विपरीत, ऊर्ध्व-पुण्ड्र के बिना किए गए कर्मों की निष्फलता तथा कभी-कभी दोष-भय का भी वर्णन है। तिलक का सही रूप—सीधा, दण्डाकार, और बीच में नियत माप का अवकाश—नियमपूर्वक बताया गया है। वेङ्कटाद्रि की मिट्टी, गंगा-तट की मृदा, तुलसी-मूल की मिट्टी और प्रमुख तीर्थ-क्षेत्रों की पवित्र मृत्तिका को तिलक हेतु श्रेष्ठ कहा गया है। वर्ण और स्त्री-पुरुष भेद से पुण्ड्रों की संख्या/माप तथा अंगों पर विष्णु-नामों के न्यास और ध्यान की विधि भी दी गई है।
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