Adhyaya 224
Uttara KhandaAdhyaya 2240

Adhyaya 224

The Glory of Sudarśana (and the Marks of Vaiṣṇava Worship)

अध्याय 224 का आरम्भ राजा-ऋषि दिलीप के प्रश्न से होता है—अक्षय हरि-भक्ति कैसे प्राप्त हो। फिर प्रसंग कैलास का स्मरण बन जाता है, जहाँ गिरिजा (पार्वती) महादेव से पूछती हैं कि विष्णु-भक्ति सबके लिए मुक्तिदायिनी और पाप-नाशिनी कैसे है। शिव उपनिषद्-भाव में नारायण को परम सत्य, सर्वाधार और परम मोक्षदाता बताते हैं। इसके बाद वे वैष्णव-उपासना के ठोस लक्षण गिनाते हैं—ऊर्ध्व-पुण्ड्र धारण, मंत्र-जप, नाम-स्मरण, श्रवण-कीर्तन, द्वादशी-व्रत, तुलसी का रोपण-पूजन, और विशेषतः शंख-चक्र (तथा पंचायुध) के चिह्न धारण। अंत में वे बताते हैं कि बाह्य वैष्णव-चिह्न तभी सार्थक हैं जब भीतर वैष्णवता हो—वैराग्य, करुणा, आत्म-ज्ञान और शुद्ध आचरण। भीतर की वृत्ति और बाहर की साधना का मेल ही सच्ची भक्ति है।

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