Adhyaya 220
Uttara KhandaAdhyaya 2200

Adhyaya 220

Description of Indraprastha (within the Kāliṃdī-māhātmya)

इस अध्याय में प्रयाग को ‘तीर्थराज’ कहकर सर्वोच्च महिमा दी गई है। नारद के प्रश्न पर पुलस्त्य बताते हैं कि गन्धर्व विश्वावसु सुमेरु पर ब्रह्मा की सभा में गया और उसने ब्रह्मासन के निकट इन्द्रप्रस्थ/शक्रप्रस्थ को विशेष सम्मानित देखा; अन्य प्रमुख तीर्थ मानो सेवक-रूप में वहाँ उपस्थित थे। इस दिव्य दृश्य से तीर्थों की प्रतिष्ठा और क्रम का संकेत मिलता है। फिर एक दृष्टान्त आता है। माहिष्मती की धनाढ्य गणिका मोहिनी अनेक पापों से ग्रस्त थी, पर वृद्धावस्था और नरक-भय से वह धर्म की ओर मुड़ी और लोकहित के कार्य व दान करने लगी। वन में विश्वासघात से घायल होकर मृत्युशय्या पर पड़ी मोहिनी को प्रयाग-जल लिए एक वैखानस मुनि मिले; उनके द्वारा मुख पर छिड़का गया वह जल ही उसके लिए उद्धार का कारण बना। फलतः उसका पुनर्जन्म द्राविड देश में रानी के रूप में हुआ, और आगे हेमाङ्गी की कथा की ओर बढ़ते हुए तीर्थ-फल से कर्म-परिवर्तन और नई सामाजिक-आध्यात्मिक पहचान का संदेश दिया गया है।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.