
The Glory of Madhuvana: Viśrānti Tīrtha, Śrāddha, and Lineage-Liberation
इस अध्याय में मधुवन (विश्रान्ति-तीर्थ) के माहात्म्य के साथ श्राद्ध-प्रयोग का सूक्ष्म विधान बताया गया है। मुनि-पुत्र मधुवन पहुँचकर विष्णु का आवाहन करता है, ब्राह्मणों को विधिपूर्वक आसन देता है, अर्घ्य आदि अर्पित करता है, पिण्डदान की मर्यादा निभाकर श्राद्ध पूर्ण करता है। इसके फलस्वरूप पितृगण दिव्य विमानों से प्रकट होकर कहते हैं कि मधुवन में किया गया श्राद्ध उन्हें राक्षस, छिपकली, सूअर/कुत्ते तथा स्थावर जैसी अधम योनियों से छुड़ाकर दिव्य लोक प्रदान करता है। अंत में विश्रान्ति-तीर्थ पर स्वयं श्रीहरि दर्शन देते हैं और भक्त को वैकुण्ठ ले जाते हैं—यहाँ तीर्थ-सेवा, श्राद्ध और भक्ति को वंश-उद्धारक मोक्ष-पथ बताया गया है।
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