Adhyaya 212
Uttara KhandaAdhyaya 2120

Adhyaya 212

Description of the Glory of Kośalā (Indraprastha/Śakraprastha; Dakṣiṇa-Kośalā)

इस अध्याय में राजोपदेश के रूप में तीर्थ-माहात्म्य कहा गया है। कोसलादेश का इन्द्रप्रस्थ/शक्रप्रस्थ सभी तीर्थों में श्रेष्ठ, भोग और मोक्ष देने वाला तथा विष्णु-प्रिय ‘पुत्री’ के समान बताया गया है। बदरिकाश्रम या नारायण-धाम जाने को उद्यत एक मोक्षार्थी ब्राह्मण को भीतर के उपदेशक द्वारा रोका जाता है और अनेक दृष्टान्तों से समझाया जाता है कि कोसला को छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि यहीं वैराग्य और मुक्ति सहज मिलती है। तत्पश्चात श्रीभगवान् हरि तेजोमय रूप में प्रकट होकर इन्द्रप्रस्थ को तीर्थों में अग्रगण्य घोषित करते हैं और कहते हैं कि सर्वत्र फल देने वाला मैं ही अन्तरात्मा हूँ। वह ब्राह्मण विष्णु-भाव/पद में प्रवेश कर परमगति पाता है। दक्षिण के ब्राह्मण साथी वहाँ उपवास करके देह त्यागते हैं, स्तुति करते हुए सारूप्य और आगे चलकर सेवाभाव प्राप्त करते हैं। यह तीर्थ ‘दक्षिण-कोसला’ नाम से प्रसिद्ध है; ‘उत्तर-कोसला’ रामावतार और रावण-वध से सम्बद्ध कहा गया है। इस कथा का श्रवण कलि के मल को धोकर विष्णु के चरणों तक पहुँचाने वाला बताया गया है।

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