
The Narrative and Glory of Dvārakā (Dvārakā Māhātmya)
द्वारका में विमल और एक ब्राह्मण विष्णु-भक्ति की कामना से स्नान करते हैं। तभी आकाशवाणी होती है कि यह तीर्थ भक्ति को जगाता है और अज्ञान से उत्पन्न मोह का नाश करता है। दोनों ब्राह्मण संसार के संबंधों की क्षणभंगुरता पर विचार कर श्रीपति के चरणों में शरण ग्रहण करते हैं। इसके बाद एक यात्री ब्राह्मण निर्जल प्रदेश में पहुँचता है, जहाँ भूख-प्यास से पीड़ित राक्षसियाँ उसे खाने को दौड़ती हैं; वह वैदिक मंत्रों से अपनी रक्षा करता है। वह अपनी तीर्थयात्रा—द्वारका सहित—का वृत्तांत सुनाकर अपने पात्र में रखे द्वारका-जल का छिड़काव उन पर करता है; इससे उन्हें पूर्वकर्म की स्मृति लौट आती है, वे राक्षसी देह त्यागकर अप्सराएँ बनकर स्वर्ग को जाती हैं। अध्याय के अंत में फलश्रुति है कि द्वारका-माहात्म्य का श्रवण महान दानों के समान फल देता है तथा भक्ति, पुत्र-प्राप्ति और स्वर्गारोहण प्रदान करता है।
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