
Glorification of Kālindī (Yamunā): The Nigamodbodhaka Tīrtha at Indraprastha
शिवशर्मा, विष्णुशर्मा से कहता है कि वैश्य शरभ और उसकी पत्नी ने पुत्र-प्राप्ति के लिए चण्डिका की आराधना की। अम्बिका ने उन्हें इन्द्रप्रस्थ में कालिन्दी (यमुना) के परम पुण्य ‘निगमोद्बोधक’ तीर्थ का उपदेश दिया, जिसे बृहस्पति ने प्रतिष्ठित किया था; वहाँ स्नान करने से वेद-बुद्धि जागती है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। शरभ ने स्नान, शत गौ-दान और पितृ-तर्पण किया; उसी पुण्य से शिवशर्मा का गर्भाधान हुआ। आगे चलकर पिता गृह-भार उसे सौंपकर गोविन्द-भक्ति और वैराग्य में प्रवृत्त हो गया। फिर तीर्थ-माहात्म्य में शरभ के रोग, एक लोभी यात्री की ठगी और मार्ग के कारवाँ पर राक्षस विकट के आक्रमण का वर्णन आता है। तीर्थ-जल के स्पर्श से विकट को पूर्वजन्म-स्मृति हुई; उसने अपने घोर पापों का स्वीकार किया और सुधार कर धर्ममार्ग अपनाया। अंततः यह ‘तीर्थराज’ स्नान, दान और भक्ति के द्वारा कर्म-बन्धन का क्षय दिखाता है; विष्णु गरुड़ पर प्रकट होते हैं और शरभ को साथ लेकर वैकुण्ठ ले जाते हैं।
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