
Rudra’s Grace/Boons (Rudraprasāda)
इस अध्याय में बदरिकाश्रम की महिमा का वर्णन है और उसे पर्वतों में सर्वाधिक पुण्यदायक बताया गया है। हिमालय-शिखर पर भगवान नरा-नारायण का नित्य निवास कहा गया है तथा उनकी श्वेत और श्याम—दो रूपों में प्रकटता का उल्लेख है। तीर्थयात्रा का परिश्रम भी साधक के लिए अत्यन्त फलदायी माना गया है। उत्तरायण में वहाँ पूजा-आराधना विशेष रूप से बढ़ती है, पर हिमपात के कारण कुछ महीनों तक उपासना में बाधा आती है; सूर्य के दक्षिणायन होने पर मार्ग फिर सुगम होता है—यह ऋतु-क्रम भी बताया गया है। अलकनन्दा को गङ्गा-स्वरूप मानकर उसके स्नान और दर्शन से महापापों तक का शोधन होने का आश्वासन दिया गया है। अन्त में वरदान-संवाद आता है: श्रीनारायण रुद्र को कैलास के स्वामी और जगत्-रक्षक कहकर स्तुति करते हैं। रुद्र स्थायी भक्ति और ऐसी कीर्ति माँगते हैं कि वे उपासकों के लिए मोक्षदायक उपकारक के रूप में प्रसिद्ध हों—इस प्रकार शैव तपस्या और वैष्णव अनुग्रह का समन्वय दिखाया गया है।
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