
Procedure and Theology of Indra’s Sacrifice at the Kāliṇdī (Yamunā) Tīrtha
ऋषियों के पूछने पर सूत बताते हैं कि सौभरि ने युधिष्ठिर को कालीन्दी (यमुना) की महिमा और वैकुण्ठ से सम्बद्ध परम तीर्थ का उपदेश दिया। फिर कथा कालीन्दी-तट के रमणीय खाण्डव वन में पहुँचती है, जहाँ नारद और पर्वत के पास राजा शिबि वन में दिखने वाले अद्भुत यज्ञ-चिह्नों का कारण पूछते हैं। नारद कहते हैं कि नरसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु के वध के बाद इन्द्र का राज्य पुनः स्थापित हुआ। तब शक्र ने हरि की आराधना हेतु यज्ञ करने की इच्छा की; बृहस्पति ने उसे खाण्डव–कालीन्दी तट पर यज्ञ करने का निर्देश दिया। इन्द्र ने वहाँ महान यज्ञ किया और विष्णु ब्रह्मा तथा शिव के साथ प्रकट होकर यज्ञ को अनुग्रहित करते हैं। इसके बाद अध्याय में तत्त्व-चिन्तन आता है—त्रिमूर्ति का एकत्व, माया से प्रतीत होने वाली बहुलता, और भक्ति का सर्वजन-हितकारी स्वरूप। अंत में भक्ति-नीति बताई जाती है: देवताओं की निन्दा न करना, वेद-मार्ग का पालन, और मान्य भक्ति-प्रकारों का आचरण।
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