
Procedure and Merit of the Seven-Day Śrīmad Bhāgavata Recitation
इस अध्याय में कलियुग के लिए श्रीमद्भागवत-सप्ताह को यज्ञ के समान पूर्ण साधन बताया गया है। शुभ मुहूर्त, मास, तिथि, वार, नक्षत्र आदि का चयन, मंडप व आसन-व्यवस्था, वक्ता की योग्यता और उसकी सेवा, तथा गणेश, देवी, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य की पूर्व-पूजा के साथ ग्रंथरूप में हरि का पूजन करने की विधि कही गई है। प्रतिदिन पाठ का क्रम, उपवास, असमर्थ होने पर न्यूनतम अर्पण, व्रत-आहार, और सत्य-शौच-नियम आदि आचार-संयम भी बताए गए हैं। फिर कथा-प्रसंग में शुकदेव का आगमन, कीर्तन के बीच हरि का प्राकट्य और वरदान-प्रदान वर्णित है। कुमार सप्ताह की कलियुग में विशेष प्रभावशीलता की प्रशंसा करते हैं; व्यास–नारद–शुक–सूत परंपरा से भागवत-परंपरा का स्मरण कराते हुए पुराणों में भागवत की सर्वोच्चता पुनः स्थापित की जाती है।
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