
Liberation of Dhundhukārī the Preta: Glory of the Seven-Day Bhāgavata Recitation and the Sūrya Hymn
आत्मदेव के चले जाने के बाद धुन्धुकारी अपनी माता को भयभीत करता रहा और उसी आतंक से उसकी मृत्यु हो गई। गोकर्ण ने माता के प्रेतकर्म आदि किए और तीर्थयात्रा पर निकल पड़ा; गया में श्राद्ध भी किया। उधर धुन्धुकारी पापमय जीवन के कारण वेश्याओं द्वारा मारा गया और प्रेत बनकर जल-विहीन, तृष्णा-पीड़ा से अत्यन्त दुःखी रहा। वह लौटकर गोकर्ण के सामने भयानक रूपों में प्रकट हुआ, अपने पाप स्वीकार किए और कहा कि केवल गया-श्राद्ध से उसे मुक्ति नहीं मिली। गोकर्ण ने विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श किया; उन्होंने सूर्यदेव की स्तुति की। तब भास्कर ने उपाय बताया—सात दिन का श्रीमद्भागवत-सप्ताह और ‘वाञ्छा-चिन्तामणि’ स्तोत्र का पाठ। तुंगभद्रा तट पर गोकर्ण ने सप्ताही कथा कराई; सातवें दिन धुन्धुकारी प्रेतबन्धन से मुक्त होकर वैकुण्ठ चला गया। फिर दूसरे सप्ताह में श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ और श्रोतागण सहित सबका गोलोक-गमन बताया गया। इस प्रकार भागवत-कथा-श्रवण को सर्वजन-उद्धारक कहा गया है।
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