Adhyaya 195
Uttara KhandaAdhyaya 1950

Adhyaya 195

Bhāgavata Māhātmya: The Jñāna-Yajña at Gaṅgādvāra and the Seven-Day Bhāgavata Hearing

इस अध्याय में कलियुग के लिए सर्वसुलभ साधना के रूप में भागवत-सप्ताह (सात दिन का श्रवण) की विधि और उसका उद्धारक कारण बताया गया है। नारद शुकदेव के उपदेश से प्रकाशित ज्ञान-यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं, ताकि भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति हो। कुमार उन्हें गंगाद्वार के निकट पवित्र नदी-तट पर अनुष्ठान करने को कहते हैं, जहाँ क्षेत्र-प्रभाव से हृदय कोमल होते हैं और वैर-भाव मिटता है। वहाँ ऋषि, शास्त्र, तीर्थ और अनेक लोकों के प्राणी एक दिव्य सभा में एकत्र होकर यज्ञों और तीर्थ-यात्राओं से भी श्रेष्ठ भागवत की महिमा गाते हैं। भागवत को बारह स्कंधों वाला और अठारह हजार श्लोकों का ग्रंथ कहा गया है; नित्य-पाठ की प्रशंसा की गई है, और अल्पायु व दुर्बलता से ग्रस्त कलियुगियों के लिए सात दिन का श्रवण सर्वोत्तम और संभव उपाय बताया गया है। उद्धव–कृष्ण प्रसंग से ग्रंथ की प्रामाणिकता स्थापित होती है—श्रीकृष्ण अपने तेज को भागवत में प्रतिष्ठित कर उसे हरि की वाणी-स्वरूप मूर्ति बना देते हैं। कथा आरंभ होते ही भक्ति प्रकट होकर कृष्ण-कथा से युवती-सी हो जाती है और निवास माँगती है; कुमार उसे दयालु गोविंद-भक्तों के बीच रहने का उपदेश देते हैं, जहाँ मन-निग्रह और हरि में एकाग्रता पुष्ट होती है।

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