
The Greatness of the Śrīmad Bhāgavata
इस अध्याय में कलियुग के रोग और उसके उपचार का वर्णन पुराण-परंपरा के बहुस्तरीय संवाद में होता है। सूत कथा का सूत्रपात करते हैं; भीतर की कथा में नारद, सनकादि कुमार और दिव्य ‘व्योमवाणी’ प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यहाँ भक्ति को श्रीकृष्ण की परम प्रिय शक्ति और कलियुग में मुक्ति का एकमात्र प्रभावी साधन कहा गया है; भक्ति से रहित ज्ञान, कर्म, तप, तथा केवल वेदाध्ययन को अपर्याप्त बताया गया है। मुक्ति को ज्ञान और वैराग्य की जननी रूप में दिखाया गया है, जो पाखण्ड और उपेक्षा के कारण कलि में क्षीण हो जाती है। वेद-वेदान्त तथा गीता-पाठ से उन्हें जगाने के प्रयास भी कलि-दोषों के कारण पूर्ण फल नहीं देते। तब व्योमवाणी एक गुप्त ‘धर्मकर्म’ का संकेत देती है; नारद कुमारों के पास पहुँचते हैं और वे उपाय बताते हैं—‘ज्ञानयज्ञ’, जो विशेषतः श्रीमद्भागवत की कथा-श्रवण और प्रवचन के रूप में सिद्ध होता है। श्रीमद्भागवत को वेद-उपनिषदों का सार-रस, कलि-दोषों का नाशक, और प्रत्येक घर में भक्ति, ज्ञान व वैराग्य को पुष्ट करने वाला कहा गया है।
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