
The Greatness of the Śrīmad Bhāgavata (Bhāgavata Māhātmya)
इस अध्याय में श्रीमद्भागवत को समस्त पुराणों में परम और कलियुग का जीवन-रक्षक बताया गया है। शिव-पार्वती संवाद तथा नैमिषारण्य में सूत-शौनक संवाद के माध्यम से श्रोता भागवत की महिमा, उसकी परंपरा-उत्पत्ति और यह पूछते हैं कि भक्ति से विवेक, ज्ञान और वैराग्य कैसे प्रकट होते हैं। कहा गया है कि भागवत का श्रवण-पठन हरिधाम प्रदान करता है; वर्ष-पर्यंत, मास-पर्यंत तथा विशेषतः सात दिन का ‘भागवत-सप्ताह’ मुक्तिदायक है। अंतरकथा में नारद कलि के पतन से दुःखी होकर वृन्दावन आते हैं और वहाँ भक्ति को युवती रूप में देखते हैं, पर उसके पुत्र ज्ञान और वैराग्य वृद्ध और निष्क्रिय हो गए हैं। वृन्दावन से भक्ति तो नवयौवना होती है, किंतु पुत्रों का जीर्णत्व बना रहता है; तब कलि को सहन करने का कारण और पुनरुद्धार का उपाय पूछा जाता है। उत्तर में केशव-कीर्तन और भागवत-कथा के प्रचार को प्रधान साधन बताया गया है, जिससे भक्ति का विस्तार होकर ज्ञान-वैराग्य पुनः जाग्रत होते हैं।
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