Adhyaya 188
Uttara KhandaAdhyaya 1880

Adhyaya 188

The Greatness of the Gītā (Liberation through Recitation and Contact-Merit)

अध्याय का आरम्भ महादेव के उपदेश से होता है। वे भवानी से कहते हैं कि अब वे मोक्ष देने वाला रहस्य और अधिक बताएँगे, इसलिए भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को श्रद्धा से सुनो। फिर कथा कश्मीर-देश में सरस्वती से सम्बद्ध, शुद्ध वाणी वाले प्रदेश में पहुँचती है, जहाँ मित्रता में बँधे दो राजा शिकार के बहाने एक श्वनी (कुतिया) और एक खरगोश को लेकर शर्त लगाते हैं। दौड़-पीछा और उलटफेर के बीच दोनों प्राणी उस कीचड़/जल के स्पर्श में आते हैं जो एक ब्राह्मण वत्स के चरण-प्रक्षालन से बना था; वह ब्राह्मण गीता के चौदहवें अध्याय का निरन्तर पाठ करता था। उस चरणोदक-स्पर्श के पुण्य से कुतिया और खरगोश अपनी नीच योनियाँ छोड़कर दिव्य विमानों से स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। वत्स का शिष्य (स्वकंधर) राजा को उनके पूर्वकर्म बताता है—जुआ खेलने वाले ब्राह्मण का पाप, परस्त्रीगमन और हिंसा; वैर जन्म-जन्म तक चलता है, पर पवित्र गीता-पाठ के संग से कट जाता है। अंत में राजा भी श्रद्धा से गीता का अध्ययन कर परम पद को प्राप्त होता है।

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