Adhyaya 187
Uttara KhandaAdhyaya 1870

Adhyaya 187

Gītā-māhātmya: The Glory of the Thirteenth Chapter (A Harihara-pura Exemplum of Fall and Release)

देवी ने भगवान् श्रीकृष्ण की भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का माहात्म्य पूछा। महादेव ने उसके ‘समुद्र-तुल्य’ गौरव का वर्णन करने का वचन दिया। कथा तुङ्गभद्रा-तट के हरिहरपुर में घटित दृष्टान्त के रूप में आती है—ब्राह्मण हरिदीक्षित और उसकी पत्नी दुराचाराः, जो नित्य अपराध, मद्यपान और कुकर्मों में लिप्त होकर रात्रि में क्रीड़ा-वन की ओर जाती है। वसन्त की चाँदनी में काम-मोह, भ्रम और विरह-विलाप का प्रसंग बनता है। वहीं उसे एक बाघ मिलता है, जो अपने पूर्व मानव-जन्म का पाप स्वीकार करता है—लोभ, अनुचित पुरोहित-व्यापार, और शोषणकारी आचरण के कारण वह बाघ-योनि में गिरा और पापियों का भक्षक बना। दुराचाराः मारी जाती है, यमलोक ले जाई जाती है, दीर्घ नरक-यातनाएँ भोगकर नीच योनियों में पड़ती है। अंततः पुण्य-सान्निध्य तथा गीता के तेरहवें अध्याय के बार-बार पाठ और श्रवण से उसका उद्धार होता है; वह चाण्डाल-देह से मुक्त होकर दिव्य लोक को प्राप्त करती है।

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