Adhyaya 180
Uttara KhandaAdhyaya 1800

Adhyaya 180

Glory of the Bhagavad Gītā, Chapter 6 (Dhyāna-yoga)

इस अध्याय (उत्तरा खण्ड 6.180) में भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यान-योग) की मोक्षदायिनी महिमा का प्रतिपादन है। कथा गोदावरी-तट के प्रतिष्ठान से आरम्भ होकर तीर्थ-यात्रा के क्रम में काशी-विश्वेश्वर, गया-गदाधर, केदार, द्वारका, सोमनाथ, अवन्तिका-महाकाल, ओंकार, श्रीशैल-मल्लिनाथ, विट्ठल, ब्रह्मगिरि-त्र्यम्बक, मथुरा तथा कश्मीर के माणिक्येश्वर तक विस्तार पाती है। फिर दृष्टान्त आता है—हंस राजा ज्ञानश्रुति के तेज की तुलना ऋषि रैक्य के तेज से करके राजा को तुच्छ बताते हैं। राजा अपने सारथी से रैक्य को खोजवाता है, दान-उपहार अर्पित करता है, परन्तु तिरस्कार पाकर विनयपूर्वक रैक्य की महानता का कारण पूछता है। रैक्य बताता है कि उसका असह्य तेज गीता के छठे अध्याय के नित्य पाठ से है; राजा भी उसे सीखकर पाठ करता है, और केवल इस एक अध्याय के पाठ से भी मुक्ति सुनिश्चित कही गई है।

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