Adhyaya 18
Uttara KhandaAdhyaya 180

Adhyaya 18

The Great Festival of Jālandhara’s Slaying (Jālandhara-vadha)

इस अध्याय में नारद राजा से जालन्धर-वध के महान उत्सव का वर्णन करते हैं। शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्य-दानव विशाल सेना लेकर शिव को घेर लेते हैं और जयाऽ नामक मायामयी गौरी-रूप से उन्हें मोहित करने का प्रयास करते हैं। तब ब्रह्मा और हरि/कृष्ण शिव को उस छल का बोध कराते हैं, और फिर घोर संग्राम पुनः आरम्भ होता है। शिव के भयानक रूप के सामने भी जालन्धर निर्भय रहता है; वह दण्ड नहीं, अपितु परम सायुज्य-मोक्ष का वर माँगता है। अंततः चक्र-प्रयोग के प्रसंग से उसका शिरच्छेद होता है और दैत्य-देहों की बढ़ती हुई उत्पत्ति भी शांत कर दी जाती है। शिव की आज्ञा से योगिनियाँ और मातृकाएँ (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही आदि) शेष असुर-भागों का संहार/भक्षण करती हैं और वर पाती हैं; पार्वती का शिव से पुनर्मिलन होता है। अध्याय के अंत में कर्म की अनिवार्यता, श्रवण-कीर्तन का महात्म्य और तुलसी-माहात्म्य की ओर सेतु दिया गया है—भक्ति, कथा-श्रवण और तुलसी-पूजन से पाप नष्ट होकर समृद्धि व मुक्ति प्राप्त होती है।

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