Adhyaya 168
Uttara KhandaAdhyaya 1680

Adhyaya 168

The Glory of Vārtraghnī (the Vṛtra-Slayer Confluence)

महादेव पार्वती से वार्त्रघ्नी-तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। वहाँ स्नान करने से अपार पुण्य मिलता है और तिल-पिण्ड-श्राद्ध करने से वंश-शुद्धि तथा पितृ-तृप्ति होती है। पार्वती नदी के नाम की व्युत्पत्ति और इन्द्र के वहाँ आने का कारण पूछती हैं। शिव युधिष्ठिर–भीष्म के प्राचीन प्रसंग का स्मरण कराते हुए वृत्र और इन्द्र के दीर्घ युद्ध का वर्णन करते हैं। पराजित इन्द्र शरण लेकर संगम पर शिव के दर्शन पाता है; शिव के भस्म से ‘भस्मगात्र/भूतेश्वर’ नामक लिङ्ग प्रकट होता है, जिसके दर्शन से ब्रह्महत्या-दोष का नाश होता है। वृत्र-वध के बाद ब्रह्महत्या भयावह रूप धारण कर इन्द्र को पकड़ लेती है। ब्रह्मा उसके निवास का निश्चय कर पाप के चार भाग अग्नि, वनस्पति, अप्सराएँ और जल को देते हैं; आगे चलकर मनुष्यों के कुछ दोष-आचरण उन-उन भागों को खींच लेते हैं। इन्द्र तीर्थ पर तप करके शुद्ध होता है और स्वर्ग को प्राप्त होता है; अध्याय अंत में इस संगम-तीर्थ की महिमा पुनः स्थापित करता है।

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