
The Glory of the Candreśvara Sacred Ford at the Candrabhāgā Confluence
इस अध्याय में दुग्धेश्वर के पूर्व दिशा में चन्द्रभागा के संगम पर स्थित परम पावन तीर्थ का वर्णन है, जहाँ महादेव ‘चन्द्रेश्वर’ रूप में विराजते हैं। सोम के दीर्घ तप और नदी-तट पर शुक्र के तप से इस क्षेत्र की महिमा प्रकट हुई—इसी से लिङ्ग का नाम ‘चन्द्रेश्वर’ और इसकी तीर्थों में श्रेष्ठता बताई गई है। यहाँ स्नान, तीर्थ-जल का पान, नित्य ध्यान और शिव-पूजा करने से धर्म और अर्थ की सिद्धि तथा घोर पापों का नाश कहा गया है। रुद्र-मन्त्र जप, वृषोत्सर्ग, तिल-पिण्ड सहित श्राद्ध और दान विशेष फलदायी बताए गए हैं। कलियुग में तीर्थ के गुप्त हो जाने की परम्परा तथा एक दृश्य स्वर्ण-लिङ्ग का उल्लेख है; तट पर वट-वृक्ष लगाने से कल्प-कल्प तक शिवलोक की प्राप्ति कही गई है।
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