Adhyaya 152
Uttara KhandaAdhyaya 1520

Adhyaya 152

The Greatness of Bālāpendra (Bālāpa) Sacred Ford

महादेव पार्वती से कहते हैं कि साब्भ्रमती/अभ्रमती नदी पर ‘बालाप’ नाम का परम तीर्थ है, जो भोग और मोक्ष दोनों देता है। इसकी पवित्रता कण्व ऋषि की पुत्री बालावती की कथा से प्रकट होती है। वह सावित्री-सूर्यव्रत का कठोर पालन कर सूर्यदेव को पति रूप में पाने हेतु घोर तप करती है। सूर्यदेव परीक्षा के लिए छद्म रूप में आते हैं, पाँच बेर पकाने को देते हैं और उसके अडिग नियम-पालन को देखते हैं; वह अग्नि में बार-बार अपने चरण तक अर्पित करने जैसी असह्य तपस्या करती है। प्रसन्न होकर सूर्यदेव अपना दिव्य स्वरूप दिखाते हैं, वर देते हैं, उसी के नाम पर तीर्थ का नाम ‘बालाप’ रखते हैं और अपने लोक में निवास का आश्वासन देते हैं। अध्याय में स्नान, तीन-रात्रि व्रत, सूर्योदय-दर्शन, तथा रविवार, संक्रान्ति, सप्तमी और ग्रहण के विशेष समय बताए गए हैं। गुड़-धेनु, लाल गाय और बैल का दान, गुड़युक्त खीर का नैवेद्य, और लाल सूर्य की पुष्प-पूजा का विधान है। एक दूसरा दृष्टान्त—त्यागे गए वृद्ध भैंसे तथा अस्थि-निक्षेप से कन्नौज के राजकुमार के जातिस्मर होने—से अक्षय पुण्य, श्राद्ध की सिद्धि और तीर्थ पर महीषेश्वर की स्थापना-पूजा का महत्त्व बताया गया है। निष्कर्ष यह कि यहाँ स्नान महानदियों के पुण्य के तुल्य है और पुनर्जन्म का अंत करता है।

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