Adhyaya 150
Uttara KhandaAdhyaya 1500

Adhyaya 150

The Greatness of Jāmbavata (Jambū) Tīrtha and Jāmbavanteśvara

इस अध्याय में जाम्बू/जाम्बवत तीर्थ की महिमा कही गई है। इसे कलियुग में “स्वर्ग की सीढ़ी” बताया गया है, जहाँ स्नान करने से पापों का नाश होता है। दाशाङ्ग पर्वत पर जाम्बवान ने देवताओं द्वारा पूजित जाम्बवन्तेश्वर नामक पवित्र लिंग की स्थापना की, जो अत्यन्त पूज्य माना गया है। रामायण-स्मृति के अनुसार रावण-वध और सीता-प्राप्ति के बाद जयघोष और नगाड़ों की ध्वनि गूँजती है तथा विजयी दल उस घाट पर स्नान करता है। महादेव उमा से कहते हैं कि जाम्बवन्तेश्वर में स्नान करने से रुद्रलोक में सम्मान मिलता है और राम-स्मरण से संसार-बन्धन कट जाता है। अध्याय का सिद्धान्त यह है कि राम और रुद्र में अभेद है। “राम” नाम का जप सभी युगों में अभीष्ट फल देता है; और दान, विशेषकर भूमिदान, जाम्बवन्तेश के दर्शन से सहस्रगुण फलित होता है।

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