Adhyaya 15
Uttara KhandaAdhyaya 150

Adhyaya 15

Vṛndā’s Attainment of Brahman-Status (within the Jālandhara Episode)

जालंधर-प्रसंग में हरि संन्यासी-वेश धारण कर राक्षस द्वारा अपहृत वृंदा की रक्षा करते हैं। भयभीत वृंदा शरण लेती है और तपोवन के अद्भुत दृश्य देखती है; वहाँ देवशर्मा तपस्वी, व्याध, अप्सराओं तथा काम-दूती के प्रसंग भी आते हैं। आगे हरि की माया से पति-रूप में उसके साथ मिलन का भ्रम रचा जाता है; वृंदा की पतिव्रता-निष्ठा ही कथा का केंद्र बनती है। सत्य जानकर वह धर्म-भंग का कठोर आरोप करती है, विष्णु को शाप देती है और वे अंतर्धान हो जाते हैं। इसके बाद वृंदा घोर तप करती है और अंततः देह त्याग देती है; देवगण उसकी पवित्रता की पुष्टि करते हैं। इस प्रसंग से तुलसी/वृंदावन की उत्पत्ति का कारण बताया जाता है और अंत में ब्रह्म-गति (मोक्ष) को अंतिम समाधान के रूप में स्थापित किया जाता है, जहाँ लीला और नैतिक उत्तरदायित्व का तनाव भी उभरता है।

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