
Mahatmya of Saṅgameśvara Tirtha and the Curse of the Hastimatī River
इस अध्याय में सङ्गमेश्वर तीर्थ की महिमा कही गई है। जहाँ हस्तिमती नदी साब्भ्रमती से मिलती है (कहीं इसे गङ्गा-संबंध से भी जोड़ा गया है), वह संगम त्रिलोकी में प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करके और महेश्वर का दर्शन करने से पाप नष्ट होते हैं तथा रुद्रलोक की प्राप्ति होती है। फिर कारण-कथा आती है—कौण्डिन्य ऋषि नदी-तट पर दीर्घ तप करते हैं, जहाँ हृषीकेश नारायण की पूजा होती है। दैववश वर्षा-ऋतु में बाढ़ आती है और आश्रम तथा संचित सामग्री बह जाती है। शोक और विघ्न से व्याकुल होकर ऋषि नदी को शाप देते हैं कि कलियुग में वह निर्जल हो जाएगी; तब वह ‘बहीश्चरी’ नाम से प्रसिद्ध होती है। शाप के बाद भी सङ्गमेश्वर तीर्थ का प्रभाव बना रहता है; केवल दर्शन से भी ब्रह्महत्या आदि महापाप नष्ट हो जाते हैं।
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