Adhyaya 144
Uttara KhandaAdhyaya 1440

Adhyaya 144

The Glory of Khaṇḍa-tīrtha and Brahmavallī (Brahma-tīrtha)

अध्याय 144 में ब्रह्मवल्ली/ब्रह्मतीर्थ और खण्डतीर्थ (वृषतीर्थ) की संयुक्त महिमा कही गई है। साब्रह्मती और ब्रह्मवल्ली जल के संगम पर स्थित ब्रह्मवल्ली को प्रयाग और गया के समान श्राद्ध-तीर्थ बताया गया है; यहाँ पिण्डदान करने से पितर बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं। ग्रहण-काल में किया गया दान विशेष रूप से अनेक गुना पुण्य देने वाला कहा गया है; स्नान करके तुलसी-माला सहित नारायण-स्मरण करने वाला स्वर्ग तथा वैकुण्ठ-गति पाता है और शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले दिव्य रूप की प्राप्ति का फल बताया गया है। इसके बाद खण्डतीर्थ की कथा आती है—गोलोक में एक प्रसंग के कारण शापित होकर कुछ गौएँ पृथ्वी पर आ गईं, पर ब्रह्मवल्ली के निकट खण्ड-सरोवर में विधिपूर्वक स्नान करके वे पुनः स्वर्ग को प्राप्त हुईं। यहाँ गौ और वृषभ की पूजा, सुवर्ण-धेनु आदि दान, गोह्रद में पितृ-तर्पण तथा पीपल और पाँच आँवले के वृक्ष लगाने का विधान है। इन कर्मों से गोलोक, पितृलोक और हरि-धाम की प्राप्ति तथा ‘अक्षय’ फल का आश्वासन दिया गया है।

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