Adhyaya 143
Uttara KhandaAdhyaya 1430

Adhyaya 143

The Greatness of the Saptadhārā Sacred Ford (including Ekadhārā and Maṅkī-tīrtha origins)

इस अध्याय में पहले एकधारा-तीर्थ का माहात्म्य कहा गया है। वहाँ स्नान करके रात्रि-पर्यन्त उपवास करने की विधि बताई गई है, जिससे पापों का क्षय, भय से रक्षा और दुष्टता का शीघ्र नाश होता है। स्वामिदेवेश का पूजन वंश-उद्धारक और कुल को पवित्र करने वाला बताया गया है। फिर सप्तधारा (सप्तसारस्वत) को परम श्रेष्ठ तीर्थ-समूह के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जिसका सम्बन्ध शिव की जटाओं से गंगा के अवतरण तथा ‘सात धाराओं’ के दिव्य संकेत से है। सप्तधारा में किया गया श्राद्ध पितरों को विशेष तृप्ति देने वाला कहा गया है। अन्त में कौषीतक-पुत्र मङ्कि ऋषि की कथा आती है—वेद-निष्ठ मुनि पुत्र-चिन्ता से गुरु के पास जाते हैं और साब्भ्रमती नदी के तट पर तप करते हैं। उनकी साधना से मङ्कितीर्थ प्रकट होता है, जो पुत्र-प्रद और मनोकामना-पूर्ति करने वाला है; द्वापर युग में पाण्डवों द्वारा वही तीर्थ सप्तधारा-रूप में प्रवर्तित हुआ।

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