
The Glory of the Sacred Ford of Hiraṇyāsaṅgama
इस अध्याय में हिरण्यासंगम नामक संगम-तीर्थ की महिमा कही गई है। महादेव देवी से कहते हैं कि प्राचीन कथा में गंगा सात धाराओं में प्रवाहित हुईं, जिनमें सातवीं धारा ‘हिरण्या’ कहलाती है। ऋक्षु और मञ्जुमय पर्वतों के बीच, सत्यवान् पर्वत के निकट यह तीर्थ स्थित है; यहाँ स्नान और जल-पान पापों का नाश करते हैं। यह स्थान वनस्थली से जुड़ा है, हरि-नारायण की कृपा दिलाता है और यहाँ हिरण्यासंगमेश्वर का पूजन विशेष फलदायक माना गया है; नरा-नारायण के तप और उर्वशी के प्राकट्य का भी स्मरण होता है। यहाँ का स्नान सहस्र कपिला-गौ दान के समान, दस अश्वमेध यज्ञों के तुल्य, ग्रहण-व्रत के बराबर तथा तुलापुरुष-दान के समान पुण्य देने वाला कहा गया है। हिरण्याक्ष के तप, जनमेजय के स्वर्ण-देह में रूपान्तर, और विश्वामित्र के शुद्धि-स्नान से शिवलोक-प्राप्ति जैसे उदाहरण दिए गए हैं। सभी वर्णों के लिए इस तीर्थ का अधिकार बताया गया है और श्रद्धा से सेवा करने पर महान् पुण्य की प्राप्ति होती है।
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