
The Glory of Agnipāleśvara (Agni-tīrtha, Pāleśvara, and Liberation through Śrāddha)
महेश्वर उमा से कहते हैं कि साभ्रमती नदी के उत्तरी तट पर अग्नि-तीर्थ और उसके निकट पालेश्वर पीठ अत्यन्त पुण्यदायक हैं। वहाँ चण्डी और योगमातृकाएँ सिद्धि प्रदान करती हैं। साधक को तीन रात्रियों का व्रत रखकर ईशान/चण्डिकेश्वर का दर्शन करना चाहिए, तथा मातृ-तीर्थ के पास भ्रमती में स्नान करना चाहिए। विशेषकर जहाँ गोकुरा साभ्रमती में मिलती है, वहाँ तिल-चूर्ण से श्राद्ध, पिण्डदान, तिलोदक-दान और ब्राह्मण-भोजन करने से अपार पुण्य और दुष्ट भूतादि से निर्भयता प्राप्त होती है। फिर दृष्टान्त आता है—कुकर्दम नामक पापी राजा प्रेत बन गया, पर पूर्व जन्म में ब्राह्मण होकर वेद-पाठ, शिव-पूजन और अतिथि-सेवा के कारण कुछ शेष पुण्य था। उसी से वह गुरु के आश्रम पहुँचा। कहोड़ ब्राह्मण की कृपा और बार-बार तीर्थ-श्राद्ध करने से कुकर्दम तथा उससे जुड़े प्रेतों को भी मुक्ति मिल गई। इससे बताया गया है कि तीर्थ-कर्म और गुरु-मार्गदर्शन घोर पाप को भी मोक्ष में बदल देते हैं।
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