
The Greatness of Sābhramatī and the Manifestation of the Kāśyapī Gaṅgā
इस अध्याय में श्रीमहादेव पार्वती से साब्भ्रमती तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। वे बताते हैं कि कश्यप ने अर्बुद पर्वत और सरस्वती के निकट कठोर तप किया; तब शिव ने अपनी जटा से गंगा को प्रकट कर काश्यपी गंगा का प्रवाह कराया। इस गंगा के केवल दर्शन से भी घोर पापों का नाश होता है—ऐसा प्रतिपादन है। फिर अनेक नदियों और प्रसिद्ध तीर्थों का वर्णन आता है तथा युगानुसार नदी के नाम—कृतवती, गिरिकर्णिका, चन्दना और साब्भ्रमती—बताए जाते हैं। स्नान, श्राद्ध और दान के विशेष फल, विशेषकर कार्तिक मास में तथा प्लक्षावतरण, केशरन्ध्र, ब्रह्मचारिक आदि घाटों/तीर्थों पर, विस्तार से कहे गए हैं। मुहूर्त-विचार में कुटुप आदि शुभ समय और वर्जित कालों का निर्देश देकर पितृ-तृप्ति के कर्मों की महिमा बताई जाती है। अंत में सूर्यवंशी राजा ब्रह्मदत्त की कथा से ब्रह्मचारीश में शिव की नित्य उपस्थिति और वरदान-शक्ति सिद्ध होती है; यहाँ लोक-समृद्धि और शैव-लाभ का वचन देते हुए, पूर्वोक्त पुण्य के परम फल को विष्णुलोक-प्राप्ति से भी जोड़ा गया है।
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