Adhyaya 132
Uttara KhandaAdhyaya 1320

Adhyaya 132

Remembrance of Vishnu (The Greatness of Smaraṇa and Bhakti)

पार्वती पूछती हैं—अनन्त वासुदेव का ऐसा कौन-सा स्मरण है जिससे फिर मोह लौटकर न आए? महादेव उत्तर देते हैं कि निरन्तर स्मरण ही सच्चा स्मरण है—जैसे प्यासा जल को, ठिठुरता हुआ अग्नि को और प्रेमी प्रिय को हर क्षण याद करता है, वैसे ही भगवान का नाम-रूप-गुण मन में अविच्छिन्न रहे। फिर भक्ति की कारणता बताई जाती है—सत्संग से भक्ति जागती है और वही परम साधन है। जनार्दन की ओर किया गया कोई भी भाव, यहाँ तक कि वैर भी, अंततः उसी की प्राप्ति का कारण बन सकता है। धन, विद्या और स्वर्ग देने वाले कर्मकाण्ड की अपेक्षा नाम-स्मरण और अंतःकरण का भाव श्रेष्ठ कहा गया है; अजामिल के प्रसंग से नाम की महिमा प्रकट होती है। अंत में सर्वव्यापक विष्णु-तत्त्व, मन और कर्म के बन्धन का विचार आता है और निष्कर्ष होता है कि स्मरण और भक्ति पाप का नाश, निर्भयता और वैकुण्ठ-प्राप्ति प्रदान करते हैं।

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