
Liberation of the Rākṣasa (The Greatness of Māgha Bathing at Prayāga/Veṇī)
इस अध्याय में मकर राशि में सूर्य के स्थित होने पर माघ-स्नान की अद्भुत महिमा कही गई है। जल को स्वभावतः पवित्र और माघ मास को सभी पुण्यकर्मों में श्रेष्ठ बताया गया है। व्रत-विधान में खुले में स्नान, आहार-संयम, दिन में तीन बार विष्णु-पूजन, अखण्ड दीप-दान, घी और तिल से होम, तथा तेल, कपास, कंबल, वस्त्र, अन्न आदि का दान—अल्प स्वर्ण भी—और एकादशी के अनुरूप उद्यापन का निर्देश है। फिर तीर्थ-माहात्म्य को क्रमशः बढ़ाते हुए कहा गया है कि घर में स्नान से लेकर कुएँ-तालाब-नदियों, देवखातों और संगमों तक पुण्य बढ़ता है; परन्तु प्रयाग/वेणी सर्वोपरि है, जहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती (सीता–असिता) का संगम पापों को भस्म कर देता है। कथा-प्रसंग में काञ्चनमालिनी नामक अप्सरा के माघ-व्रत से उत्पन्न पुण्य दूसरे को दिया जाता है, जिससे एक वृद्ध राक्षस मुक्त होकर दिव्य रूप धारण करता है और अपने कर्म-कारण भी बताता है। इन्द्र की सीतासित में शुद्धि तथा शिव-पार्वती के प्रयाग में तत्क्षण पाप-नाशक वचन भी प्रमाण रूप में आते हैं। अंत में इस उपदेश के श्रवण को रक्षक और धर्म-वर्धक कहा गया है।
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