
The Greatness of Māgha: Dialogue of Vasiṣṭha and King Dilīpa (Māgha Bath, Charity, and Karmic Causality)
ऋषि पहले कहे गए कार्तिक-माहात्म्य की प्रशंसा करके सूत से माघ-माहात्म्य सुनाने का अनुरोध करते हैं। कथा भीतर के संवाद में जाती है, जहाँ पार्वती शिव से माघ के व्रत, स्नान और दान की विधि पूछती हैं; शिव माघ-मास की परम पवित्रता और उसके फल का वर्णन करते हैं। उदाहरण के रूप में शिकार पर निकले राजा दिलीप को एक वैखानस तपस्वी मिलता है, जो उन्हें माघ-स्नान का विधान जानने हेतु वसिष्ठ के पास भेजता है। वसिष्ठ (और भृगु) बताते हैं कि माघ में विशेषकर प्रातःकाल खुले जल में स्नान सर्वोत्तम है; इसके साथ तिल-दान, गो-दान, पादुका-दान, कमण्डलु/जलपात्र-दान तथा ब्राह्मण-भोजन महान पुण्य देते हैं। फिर कर्म-कारण का प्रसंग आता है: व्याघ्रमुख विद्याधर भृगु से अपने विकार का कारण पूछता है। भृगु बताते हैं कि एकादशी के बाद तेल का सेवन/अभ्यंग जैसा छोटा-सा दोष भी समय पाकर विकृति बन जाता है; उसका उपाय मणिकूट/मणिपर्वत के निकट पवित्र नदी में कठोर नियमों सहित माघ-व्रत का पालन है। अंत में कहा गया है कि माघ-स्नान दान सहित करने से पुण्य, समृद्धि और पापक्षय होता है तथा अंततः मोक्ष—अर्थात् पुनर्जन्म से निवृत्ति—प्राप्त होती है।
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