Adhyaya 123
Uttara KhandaAdhyaya 1230

Adhyaya 123

Account and Procedure of the Month-long Fast

इस अध्याय में मāsोपवास (मास-भर का उपवास) को सर्वश्रेष्ठ व्रत बताकर उसकी महिमा कही गई है। कहा गया है कि अन्य व्रतों, तीर्थ-सेवा, दान तथा बड़े श्रौत यज्ञों से जो पुण्य मिलता है, वह इस एक व्रत में संक्षेप से प्राप्त हो जाता है। व्रत के लिए गुरु की अनुमति, पहले से वैष्णव व्रतों का अभ्यास, शरीर-सामर्थ्य का विचार और शुद्धि हेतु प्रायश्चित्त आदि पूर्व-नियम बताए गए हैं; सभी आश्रमों में, स्त्रियों तथा विधवाओं तक को इसका अधिकार माना गया है। व्रत का आरम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से होकर ठीक तीस दिन तक किया जाता है। इस अवधि में वासुदेव की निरन्तर उपासना—दिन में तीन बार मंदिर-पूजन, पुष्प, चन्दन, कपूर, केसर आदि से अर्चना, सदाचार-नियम, और केवल विष्णु-नाम का उच्चारण—मुख्य विधान हैं। द्वादशी को समापन में विष्णु और गरुड़ का पूजन, ब्राह्मणों (विशेषतः तेरह) को भोजन व सम्मान, दक्षिणा, क्षमा-याचना तथा शय्या/प्रतिमा-दान जैसे प्रतीक दान करके अंत में विष्णु-धाम की प्राप्ति की कामना की जाती है।

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