Adhyaya 122
Uttara KhandaAdhyaya 1220

Adhyaya 122

The Greatness of Dīpāvalī: Yama-lamp, Naraka Caturdaśī Bath, Kaumudī (Bali Worship), Govardhana/Cow Honor, and Yamadvitīyā

इस अध्याय में कार्त्तिक-माहात्म्य के अंतर्गत दीपावली को अनेक दिनों के विधि-क्रम के रूप में बताया गया है। स्कन्द के प्रश्न पर महादेव दीपावली का प्रयोजन, अधिदेवता, दान और उत्सव-आचरण समझाते हैं। त्रयोदशी को घर के बाहर यम-दीप रखने से अकाल मृत्यु का निवारण होता है। चतुर्दशी को प्रातःपूर्व तैलाभ्यंग-स्नान करना चाहिए—तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा का भाव रखकर—अपामार्ग आदि से स्नान कर, फिर यम और चित्रगुप्त का नाम लेकर तर्पण करना चाहिए। अमावस्या को अग्नि-पूजन, देव-पितृकर्म, पार्वण-श्राद्ध, ब्राह्मण-भोजन तथा नगर-उत्सव का विधान है। आगे लक्ष्मी-जागरण, शिव-पार्वती की पासा-क्रीड़ा, अलक्ष्मी का निष्कासन, गोवर्धन-पूजा और गो-मान, तथा कौमुदी पर्व में बलि-पूजा और रात्रि-जागरण का वर्णन आता है। अंत में यमद्वितीया में यम-पूजन कर घर पर भोजन न करके बहन के हाथ से भोजन करने और दान देने से आरोग्य, समृद्धि और संरक्षण का फल कहा गया है।

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